पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को सख्त टिप्पणी करते हुए झटका दिया है। अदालत ने उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सरकारी कॉलेजों के असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी के रूप में तैनात करने का निर्णय लिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आयोग यह साबित करने में विफल रहा कि पोलिंग बूथ पर कॉलेज शिक्षकों की नियुक्ति क्यों आवश्यक थी।
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉलेज शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने इस निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। याचिका में यह तर्क दिया गया कि चुनाव आयोग की अपनी गाइडलाइन के अनुसार ग्रुप A स्तर के अधिकारियों, जैसे कॉलेज शिक्षकों, को चुनाव ड्यूटी पर तभी लगाया जा सकता है जब इसके पीछे ठोस और दर्ज कारण मौजूद हों।
शुक्रवार, 17 अप्रैल को सुनवाई के दौरान याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि चुनाव आयोग अपने निर्णय को ठोस आधार पर सही साबित नहीं कर पाया। अदालत ने टिप्पणी की कि आयोग ऐसा कोई दस्तावेज पेश करने में असफल रहा, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि विशेष परिस्थितियों के चलते याचिकाकर्ताओं को पीठासीन अधिकारी नियुक्त करना जरूरी था।
अदालत ने यह भी माना कि चुनाव आयोग के पास अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार है, लेकिन उसे अपने निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि आयोग ने फरवरी 2010 के अपने ही सर्कुलर का उल्लंघन किया है, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि ग्रुप ‘A’ स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों को चुनाव ड्यूटी में तभी लगाया जाए जब जिला निर्वाचन अधिकारी लिखित रूप में इसके ठोस कारण दर्ज करे। इसी आधार पर कोर्ट ने प्रोफेसरों की पीठासीन अधिकारी के रूप में की गई नियुक्ति को निरस्त कर दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान 13 अप्रैल को अदालत ने आयोग से यह बताने वाले दस्तावेज मांगे थे कि प्रोफेसरों की तैनाती क्यों आवश्यक थी। 16 अप्रैल को हुई अगली सुनवाई में आयोग कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सका और अतिरिक्त समय की मांग की। अदालत ने अंतिम अवसर देते हुए शुक्रवार तक जवाब दाखिल करने को कहा था, लेकिन उस दिन भी आयोग अपनी गाइडलाइन के अनुरूप कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया।
लाइव स्ट्रीमिंग के अनुसार, 16 अप्रैल की सुनवाई में जस्टिस राव ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसा ही है तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 26 के तहत जजों को भी मतदान अधिकारी बनाया जा सकता है, और उन्होंने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। यह टिप्पणी आयोग के वकील की उस दलील के जवाब में आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि धारा 26 के तहत जिला निर्वाचन अधिकारी को पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि, अदालत ने उन प्रोफेसरों को राहत दी है, जिन्होंने पहले ही प्रशिक्षण ले लिया था और चुनाव ड्यूटी के लिए तैयार थे—उन्हें यह जिम्मेदारी निभाने की अनुमति दी गई है। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग अपनी गाइडलाइन के अनुरूप याचिकाकर्ताओं को उनके पद, वेतन और स्थिति के अनुसार कोई अन्य जिम्मेदारी सौंप सकता है।
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